रविवार, 13 दिसंबर 2020

मोटराइज्ड ट्रायसाइकिल मिली तो खुशी से नम हुईं दिव्यांग सुभद्रा की आँखें

सुभद्रा की आँखें नम थीं। उनकी आँखों में आई इस नमी का कारण कोई दु:ख या परेशानी नहीं, बल्कि खुशी थी। दोनों पैरों से दिव्यांग सुभद्रा पहली बार उचित मूल्य की दुकान से खुद राशन लेकर आईं थीं। इससे पहले उन्हें राशन लेने के लिये दूसरों का मुँह ताकना पड़ता था। सरकार द्वारा दी गई मोटराईज्ड ट्राइस्किल ने उनकी इस परेशानी को दूर कर दिया है।
    ग्वालियर शहर के अंतर्गत सिद्धबाबा क्षेत्र गिरवाई निवासी दिव्यांग महिला सुश्री सुभद्रा बताती हैं कि मैंने किसी पर भार बनने की कोशिश नहीं की। पूजा की बाती बनाकर अपनी आजीविका चला लेते हैं। वे कहती हैं हर महीने जब राशन मंगाने की जरूरत पड़ती तो हमें दूसरों पर आश्रित रहना पड़ता। पैंरों की दिव्यांगता की वजह से दूर स्थित उचित मूल्य की दुकान पर पहुँचना मेरे लिये कठिन था। मध्यप्रदेश सरकार ने मोटराईज्ड ट्राइस्किल देकर मेरी यह परेशानी भी दूर कर दी है। वे कहती हैं कि जब मैं दूसरे दिव्यांगों को फर्राटा भरते हुए देखती तो मेरी भी बड़ी इच्छा होती कि काश ऐसी फट-फट मुझे भी मिल जाए। मेरा यह सपना सरकार ने पूरा कर दिया है।
   हस्तिनापुर निवासी दिव्यांग रामबरन जैतवार कहते हैं कि गाँव में मेरी छोटी सी किराने की दुकान है। अब मैं इस दुकान पर हम घिसट-घिसटकर नहीं सरकार द्वारा दी गई मोटराईज्ड ट्राइस्किल पर बैठकर फर्राटा भरकर पहुँच जाते हैं। एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी कर रहे ग्राम सेंथरी निवासी दिव्यांग दिनेश सिंह बघेल का कहना था कि नौकरी पर पहुँचना मेरे लिये अभी तक बड़ा कठिनाई भरा सफर होता था। मोटराईज्ड साइकिल मिल जाने से अब यह सफर मेरे लिये आसान हो गया है। इसी तरह एक प्राइवेट स्कूल में शिक्षक के रूप में पदस्थ ग्राम सियावरी निवासी रतनप्रकाश बोले कि अब हमें पढ़ाने के लिये जाने में बहुत आसानी हो गई है। ग्राम चक मेहरोली निवासी सरनाम सिंह जाटव भी मोटराईज्ड ट्राइस्किल मिल जाने से खुश थे। उनका कहना था कि अब हम अपनी दुकान पर शान के साथ अपनी मोटराईज्ड ट्राइस्किल पर बैठकर जाते हैं।
   इन सभी को उद्यानिकी एवं खाद्य प्रसंस्करण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री भारत सिंह कुशवाह ने अपनी विधायक निधि और सामाजिक न्याय एवं नि:शक्तजन कल्याण विभाग की धनराशि से ये मोटराईज्ड ट्राइस्किल मुहैया कराई हैं। ग्वालियर में ओहदपुर की सुरम्य पहाड़ी पर बने कलेक्ट्रेट परिसर से जब ये सभी दिव्यांगजन खुशियां मनाते कतारबद्ध होकर निकले तो एक बारगी ऐसा लगा कि इन सभी दिव्यांगजनों की उम्मीदों को पंख लग गए हैं। 

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