सोमवार, 25 जुलाई 2022

महाभारत के अंतिम चकृवर्ती सम्राट और संपूर्ण भारत के आखरी हिन्दू महाराजा दिल्लीपति महाराजा अनंगपाल सिंह तोमर का जन्म दिवस इस साल 28 जुलाई 2022 को हरियाली अमावस्या को मनाया जायेगा


दिल्लीपति महाराजा अनंगपाल सिंह तोमर महाभारत के अंतिम चकृवर्ती सम्राट और संपूर्ण भारत के आखरी हिन्दू महाराजा दिल्लीपति महाराजा अनंगपाल सिंह तोमर का जन्म दिवस इस साल 28 जुलाई 2022 को हरियाली अमावस्या को मनाया जायेगा 
 *- नरेन्द्र सिंह तोमर " आनन्द"* 
दिल्लीपति महाराजा अनंगपाल सिंह तोमर महाभारत के अंतिम चक्रवर्ती सम्राट थे । 
अंग्रेजों ने इन्हें दिल्ली का अंतिम हिंदू राजा और तोमरों का भारत पर राज करने वाला आखरी अंतिम राजवंश लिखा और कहा है । 
कुलगुरू व्यास जी के द्वारा अभिमंत्रित कील , व्यास जी के आदेश पर विक्रम संवत 1100 में केवल‌ 28 साल की उम्र में महाराजा अनंगपाल सिंह तोमर ने दिल्ली मे़ किल्ली गाड़ी थी जिसे भीमलाट कहते हैं जो महरौली में कुतुब कांपलेक्स में स्थित है , महाराजा अनंगपाल सिंह तोमर ने इस किल्ली पर अपनी तलवार की नोंक से लेख खोद दिया था जो आज भी उस पर अंकित है । इसके पास ही अपने कुल व राज पुरोहित पाठक पंडित के कहने और उनकी इच्छा के अनुसार इस किल्ली पर ही चतुर्भुजी महाविष्णु की गरूड़ पर सवार प्रतिमा विग्रह स्थापित कराया और पूजा के लिये बराबर ऊंचाई की मीनार उसके बगल में ही बनवाई जिसमें केवल सीढ़ीयां हैं , इस मीनार कांपलेक्स मे यानि मीनार के परिसर में ही 27 मंदिर पाठक पंडित राजपुरोहितों के लिये बनवाये । यह त्रिपुंड के 27 देवताओं और उनकी शक्तियों तथा योगनीयो़ के मंदिर थे । ( तोमरों के राजपुरोहित पाठकों के नाठ होने के बाद रूधावली अंबाह से राज के समय से तोमरों के कुल व राज पुरोहित अब तक उपाध्याय पंडित हैं )  
चन्द्रवंश के प्रतापी सम्राट और पांडव अर्जुन के वंशज महाराजा अनंगपाल सिंह तोमर ने सातों द्वीप और सातों समुद्र पर विजय पताका फहरा कर अपने आधीन राज्य किया और धर्मध्वजा ( पंच पताका केसरिया ध्वज - भगवान विष्णु और माता का रंग ही तोमरों का कुल का पंच पताका ध्वज है ) सभी दिशाओं मे फहराई । चंद्रमा और सात तारों यानि सप्तर्षि के निशान‌ वाला चौकोर हरा झंडा , गौ बच्छा रक्षा - तोमरो का राज चिह्न ) से सभी दिशायें चहुंओर चमक धमक कर फहरायमान हो उठीं । 
अंग्रेजों के मुताबिक राजपूत  महाराजा अनंग पाल सिंह तोमर ने दिल्ली मे किल्ली सन 1150 के आस पास गाड़ी , तोमर क्षत्रिय राजपूतों की वंशावली के मुताबिक यह विक्रम संवत 1100  में दिल्लीपति महाराजा अनंगपाल सिंह तोमर ने गाड़ी । 
दिल्लीपति महाराजा अनंगपाल सिंह तोमर के भाई मदनपाल सिंह तोमर की दो बेटियों के पुत्र‌ पृथ्वीराज सिंह चौहान और जय चंद्र सिंह राठौर सगे मौसेरे भाई थे  । 
दिल्लीपति महाराजा अनंगपाल सिंह तोमर के बड़े पुत्र को घूरे पर फिंकवाया गया था और मृत बताया गया था , जिसे एक पठान‌ को महल की दासी ने दे दिया था और पालने पोसने को कहा था , जो आगे चलकर गजनी का सुल्तान बना और मोहम्मद गौरी कहलाया । 
महल में चल रहे षडयंत्रों के चलते कुल गुरू व्यास जी ने सावधान करते हुये महाराजा अनंगपाल सिंह तोमर को कम से कम एक साल की तीर्थयात्रा के बहाने बाहर जाने और रहने का आदेश दिया जिससे उन्हें सुरक्षित रूप से पुत्र प्राप्ति हो सके । 
दिल्लीपति को 32 साल की उम्र में द्वितीय पूत्र सोनपाल सिंह तोमर की प्राप्ति चम्बल में अपने पुरखे महाराजा शांतनु और भरत के जन्मस्थान ( गढ़ चामल - वर्तमान में यह स्थान गुढ़ा चम्बल कहलाता है ) में निवास के दौरान हुई , वे उसे दिल्ली लेकर वापस पहुंचे , जहां पृथ्वीराज के मन में बेईमानी आ गयी और उसने दिल्लीपति महाराजा अनंगपाल सिंह तोमर का सिंहासन उन्हें वापस लौटाने से इंकार कर दिया और युद्ध करने के बाद जीत कर सिंहासन वापस लेने का फरमान दिल्लीपति को सुना दिया , राजपुरोहित पाठक और कुलगुरू व्यास जी ने दिल्लीपति को दोहित्र के साथ युद्ध करने और उसका वध करने से रोक दिया और कहा कि इसके बाद तुम्हारे पुरखों को राजसूर्य यज्ञ करना पड़ा और स्वजन व पूजनीय लोगो़ के वध के पाप से मुक्ति हेतु कैलाश पर भगवान शंकर की शरण में जाना पड़ा और शंकर जी उन्हें देखकर छिपते भागते फिरे थे तब नंदी रूप धरे भगवान शंकर का कूबड़ ही पांडव पकड़ पाये और उनने वहां केदारनाथ बनवाया और शंकर जी के सींग पशुपतिनाथ मे निकले जहां पांडवों ने पशुपतिनाथ मंदिर बनवाया जिसकी पूजा करके ही वे पापमुक्त हुये , इसलिये इसके साथ युद्ध और इसका वध तुम्हारे लिये उचित नहीं है , यह तुमसे उम्र में भी काफी छोटा है । 
इसके बाद दिल्लीपति चंबल में‌ वापस आ गये और ऐसाह नामक स्थान पर‌ एक छोटा सा दुर्ग बनवाकर वहां अपनी राजधानी बनाई । 
उनके बड़े पुत्र ने पृथ्वीराज से बदला लिया , छोटे पुत्र सोनपाल का विवाह नरवर के कछवाहे राजा कीरतसेन की पुत्री ककनवती से हुआ , नाती सुल्तान  शाह का विवाह करौली के जादौन राजा हमीर सिंह की पुत्री अकलकंवर से हुआ , उनके प्रपौत्र कंवरपाल का विवाह चित्तोड़गढ़ के सिसोदिया राजा रावल रतन सिंह सिसोदिया और महारानी पद्मिनी की एकमात्र पुत्री हेमावती से हुआ , उनके दो पुत्र रावल घाटम देव और रावल वीरम देव यानि वीर सिंह देव ने तोमरघार के 52, 84 और 120 गांव बसाये जिसे बावन बीसा सौं चौरासी के नाम से  तोमरघार कहते हैं ।
इसी ऐसाह गढ़ी के किले में विक्रम संवत 1199 में ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा को दिल्लीपति महाराजा अनंगपाल सिंह तोमर मोक्षलोक वासी होकर विष्णुधाम चले गये । 
दिल्लीपति महाराजा अनंगपाल सिंह तोमर की वंशावली के अनुसार उनका जन्म विक्रम संवत 1072 में हरियाली अमावस्या को सावन के महीने में दोपहर हुआ । 
 *-नरेन्द्र सिंह तोमर "आनंद " ( दिल्लीपति महाराजा अनंगपाल सिंह तोमर की 23 वीं पीढ़ी )*

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